देश के नौनिहालों एवं युवाओं को इस प्रकार शिक्षित-प्रशिक्षित-दीक्षित करना कि वे स्वयं के साथ समाज जीवन को तेजोमय, अनुशासित, प्रगतिशील, वैभव सम्पन्न, सर्व समर्थ एवं यशस्वी बनाने में अग्रणी भूमिका का निर्वहन कर सकें।
इस हेतु जिज्ञासा, शिक्षा-संस्कार, ज्ञान-प्रेरणा, आचार-व्यवहार, शोध- आविष्कार का ऐसा उत्प्रेरक वातावरण बनाना, जहाँ व्यक्ति स्वयं स्फूर्त हो अनुकरणीय व्यक्तित्व में रूपांतरित होते रहें।
उच्च शिक्षा, आधुनिक सुविधाएँ एवं विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य हेतु समर्पित संस्थान।
"शिक्षा – शून्य से शिखर तक" - यह प्रेरक सूत्र वाक्य मध्य भारत शिक्षा समिति, ग्वालियर की शिक्षा यात्रा का आधार है।
"21 जुलाई 1941 को स्वतंत्रता प्राप्ति से 6 वर्ष पूर्व, स्वर्गीय श्री बाबा गोखले जी द्वारा पार्वतीबाई गोखले विद्यालय की स्थापना की गई। उन्होंने अपनी पत्नी श्रीमती पार्वतीबाई के गहने बेचकर इस महान शैक्षिक मिशन की शुरुआत की।"
आज लगभग 85 वर्षों की गौरवशाली यात्रा के बाद यह संस्था ग्वालियर अंचल की प्रमुख, प्राचीन और प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थाओं में से एक के रूप में स्थापित है।
भारत को यदि कोई “अक्षुण्ण और जीवित सभ्यता” बनाकर आज तक खड़ा रखे हुए है, तो उसका आधार केवल “धर्म” है। धर्म वह है जो हमें “मानव” बनाता है। गालव ऋषि की तपोभूमि ग्वालियर शहर, कई एतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों को समेटे है। ग्वालियर का प्राचीनतम गणेशबाग मंदिर, 250 वर्ष पूर्व 1840 ई में स्थापित गणेश मंदिर है।
मंदिर में स्थित गणेश प्रतिमा मनमोहक है, जिसके दर्शनमात्र से ही भक्तिभाव जागृत हो जाता है। चार भुजाधारी, पीला पीतांबर धारण किए, ऋद्धि एवं सिद्धि के साथ श्री महागणेश विराजे हैं। हाथों में सुंदर पुष्प, सुंदर मुकुट एवं मूषक पर विराजे प्रभु की छवि अत्यंत मनमोहक है। मंदिर के प्रांगण में एक नवग्रह मंदिर एवं हनुमान मंदिर भी स्थापित है। ।
हमारे विद्यालय एवं महाविद्यालय विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक सुविधाएँ एवं संस्कारयुक्त वातावरण प्रदान करने के लिए निरंतर कार्यरत हैं।
ग्वालियर नगर की प्राचीनतम प्रतिष्ठित संस्था जो पूर्व में ग्वालियर एज्यूकेशन सोसायटी के नाम से जानी जाती थी वर्तमान में मध्यभारत शिक्षा समिति केनाम से समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त है। संस्था के विकास एवं सुचारू संचालन के लिये स्व. श्री सदाशिव गणेश उपाख्य बाबा गोखले एवं डॉ. हरि रामचन्द्र दिवेकर का योगदान अविस्मरणीय है। स्व. बाबा गोखले इस संस्था के संस्थापक सदस्यों में अन्यतम थे।
ग्वालियर राज्य में तत्कालीन शासकों द्वारा ग्वालियर तथा उज्जैन में उच्च शिक्षा की व्यवस्था की गई थी। उच्च शिक्षा कला एवं विज्ञान के विषयों की ही दी जाती थी। विधि की शिक्षा के प्रति तत्कालीन शासन उदासीन रहा। ग्वालियर के कुछ प्रमुख समाज सेवी एवं शिक्षाविदों ने विधि की शिक्षा की कमी का अनुभव किया।
बार काउसिल ऑफ इंडिया , नई दिल्ली के बन्धनकारी निर्देशों के फलस्वरूप सत्र 2004 - 2005 से माधव महाविद्यालय में विधि संकाय समाप्त कर दिया गया एवं उत्कनिर्देशों के अनुरूप प्रथक नविन माधव विधि महाविद्यालय के लिए मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा विभाग , भोपाल के अनापत्ति प्रमाण - पत्र दिया गया |
माधव शिक्षा महाविद्यालय ग्वालियर के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षा कॉलेज है। महाविद्यालय राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद , मध्य प्रदेश भोपाल की द्वारा मान्यता प्राप्त है और जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर से संबद्ध है। माधव शिक्षा महाविद्यालय मध्य भारत शिक्षा समिति विवेकानंद मार्ग (नई सड़क) ग्वालियर मध्य भारत शिक्षा समिति 7 अगस्त 1950 को स्थापित किया गया था ।
यह विद्यालय ७४ वर्ष पूर्व शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने के लिये प्रारंभ किया गया था .इसकी नींव समाज के प्रति समर्पित त्याग की प्रतिमूर्ति परम श्रध्देय स्व.श्री बाबा गोखले ने डाली थी . उनकी त्यागमयी भावना से प्रेरित होकर यह संस्था निरंतर अपने उद्देश के प्रति समर्पित भाव से सफलतापूर्वक कार्य कर रही है!
परम श्रद्धेय स्व. श्री बाबासाहब गोखले के असीम त्याग और परिश्रम के फलस्वरूप सन 1943 से संस्था का शुभारंभ सार्वजनिक शिशु पाठशाला के नाम से हुआ। विद्यालय के प्रारम्भ से सन 1970 तक अध्यापन कार्य मराठी एवं हिंदी दोनों ही रहा। तत्पश्चात सन 1970 से केवल हिंदी माध्यम में अध्यापन कार्य किया जाता रहा।
पार्वती विद्यापीठ मध्य भारत शिक्षा समिति द्वारा संचालित सी.बी.एस.ई. पाठ्यक्रम का पहला अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय है। इसका शुभारंभ 07 जुलाई 2024 को शहर के हृदय स्थल महाराज बाड़े के समीप, जीवाजीगंज, ग्वालियर के ऐतिहासिक, हरियालीयुक्त एवं सुरक्षित परिसर में किया गया है। विद्यापीठ का सर्वसुविधायुक्त विशाल भवन एवं खेल परिसर है।
महारानी लक्ष्मीबाई की देशभक्ति एवं बलिदान भावना को श्रद्धांजलि देते हुए, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की शताब्दी पर वीरांगना लक्ष्मीबाई शिक्षा समिति की स्थापना 1957 में की गई। समिति के संस्थापक सदस्यों में श्रीमती चन्द्रकला सहाय, डॉ. कमल किशोर, श्री कोमल सिंह सोलंकी, श्री चिमन भाई मोदी, श्री शीतला सहाय आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
विद्यालय एक दृष्टि में वीरांगना लक्ष्मीबाई शिक्षा समिति के पदाधिकारियों के असीम त्याग एवं परिश्रम के फलस्वरूप सन् 1957 में लक्ष्मीबाई स्मारक उ. मा. विद्यालय अपनी गरिमा एवं लोकप्रियता के कारण नगर में एक प्रतिष्ठित विद्यालय के रूप में विख्यात हुआ कालान्तर में यह विद्यालय उत्तरोत्तर प्रगति की ओर अपना कदम बढ़ा रहा है।
हमारे संस्थान में समय-समय पर शैक्षणिक, सांस्कृतिक, खेल एवं व्यक्तित्व विकास से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
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